तेरे जहान में बेफल शजर नहीं मिलता
तेरे जहान में बेफल शजर नहीं मिलता
बस एक अश्क है जिसका समर नहीं मिलता

अन्धेरे फैल गये है कुछ ऐसे बस्ती में
चराग़ मिल भी अगर जाये घर नहीं मिलता
मैं रोज़ कितने ही कंकड़ समेट लेता हूँ ना
मगर जो आँख से निकला गुहर नहीं मिलता
कभी तो रेते से भर जाती हैं मेरी आँखें
कभी चराग़ सरे-रहगुज़र नहीं मिलता
हमें कब उसकी तमन्ना नहीं रही ‘अहमद’
बस इस क़दर कि तलब का हुनर नहीं मिलता
बस एक अश्क है जिसका समर नहीं मिलता

अन्धेरे फैल गये है कुछ ऐसे बस्ती में
चराग़ मिल भी अगर जाये घर नहीं मिलता
मैं रोज़ कितने ही कंकड़ समेट लेता हूँ ना
मगर जो आँख से निकला गुहर नहीं मिलता
कभी तो रेते से भर जाती हैं मेरी आँखें
कभी चराग़ सरे-रहगुज़र नहीं मिलता
हमें कब उसकी तमन्ना नहीं रही ‘अहमद’
बस इस क़दर कि तलब का हुनर नहीं मिलता