ग़ुबार साफ़ करो आईने की आँखों से
मिटा के ख़ुद को तुम्हें पाना चाहता हूँ मैंहमेशा अपने ही काम आना चाहता हूँ मैं
अजीब धुन है कि मंज़िल मुझे तलाश करे
सो रास्ते से भटक जाना चाहता हूँ मैं
ग़ुबार साफ़ करो आईने की आँखों से
कि साफ़-साफ़ नज़र आना चाहता हूँ मैं
तेरा मिज़ाज बहुत कुछ बदल गया लेकिन
वहाँ नहीं है जहाँ लाना चाहता हूँ मैं
न अब दरीचा खुलेगा न कोई झाँकेगा
उधर से फिर भी गुज़र जाना चाहता हूँ मैं
यह मसअला भी है मेरी समझ के साथ ‘अक़ील’
कि दूसरों को भी समझाना चाहता हूँ मैं