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माना कि आदमी को...

Akbar Khan
माना कि आदमी को

माना कि आदमी को हँसाता है आदमी;
इतना नहीं कि जितना रुलाता है आदमी;

माना गले से सब को लगाता है आदमी;
दिल में किसी-किसी को बिठाता है आदमी;

सुख में लिहाफ़ ओढ़ के सोता है चैन से;
दुख में हमेशा शोर मचाता है आदमी;

हर आदमी की ज़ात अजीब-ओ-गरीब है;
कब आदमी को दोस्तो! भाता है आदमी;

दुनिया से ख़ाली हाथ कभी लौटता नहीं;
कुछ राज़ अपने साथ ले जाता है आदमी।
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