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तुम फिर से लौटकर नहीं आवोगी....

तुम फिर से लौटकर नहीं आवोगी
मै जानता  था
तुम चाहकर भी मेरी नहीं हो पावोगी
मै जानता  था
मिलोगी भी तो ऐसे मोड़ पर
कि हंसकर मुझे अजनबी बताओगी
मै जानता था
फिर घर जाकर कोसोगी उस अतीत को
और रोकर आंसुओ से भीग जाओगी
मै जानता था
तुम नहीं चाहोगी किसी के लिए संवरना
पर तुम नाजुक कली संवर ही जाओगी
मै जानता था
फिर से होगी तुम पर मेहर वक़्त की
और तुम हर तक्लीफ़ से उबर जाओगी
मै जानता था
एक दिन मिलेगी खबर मेरे गुजर जाने की
तो तुम बस एक लम्बी सांस भर पाओगी
मै जानता था...... अकबर खान "
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