जिस पर हम फिदा हुए...
जिस पर हम फिदा हुएबदनाम हुए
वह बेवफा निकली पत्थर की
ना समझ सका उसे
उसकी मीठी बातें थीं सुबह की ओस
जो प्यार का सूरज निकलते ही
गायब हो गयी अरमानों से
लोग समझ रहे थे उसकी यारी का गमला
लेकिन पौधा ना उग सका उनमें
खुशबूदार वट का !
यह कैसा नसीब है मेरा
किसने बनाई थी मेरी दुनिया
माफ किसे करुं, किसे ना करुं
जख्म तो सबने दिया है
अब तो डर लगता है वफा से
घाव दिल के हरे मत कर मेरे दोस्त
मुमकिन नही है उसे भुलाना..... अकबर खान